छत्तीसगढ़ी की विशेषताएँ
Saturday, November 03, 2007
यह स्पष्ट , प्रत्यक्ष और सत्य है कि छत्तीसगढ़ के लोग छत्तीसगढ़ी बोलते हैं और छत्तीसगढ़ी उनकी मातृभाषा है। छत्तीसगढ़ी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि छत्तीसगढ़ी वाक्यों के क्रियापद के लिंग नहीं होते जबकि हिन्दी में पुल्लिंग कर्ता के साथ पुल्लिंग क्रिया और स्त्रीलिंग कर्ता के साथ स्त्रीलिंग क्रिया होते हैं अर्थात् 'लड़का' कर्ता के साथ "लड़का पढ़ता है" और 'लड़की' कर्ता के साथ "लड़की पढ़ती है" कहना पड़ता है। अंग्रेजी और संस्कृत में ऐसा नहीं है। अंग्रेजी में इन्हीं दोनों वाक्यों को कहेंगे कि 'A boy reads (अ ब्वॉय रीड्स)' और 'A girl reads (अ गर्ल रीड्स)'। इसी प्रकार संस्कृत में 'बालकः पठति' और 'बालिका पठति' होता है। ठीक इसी तरह से छत्तीसगढ़ी में "टूरा पढ़थे" और "टूरी पढ़थे" होता है।
छत्तीसगढ़ी शब्दों की विशेषता यह है कि सुनने और पढ़ने में अत्यन्त सारगर्भित और गम्भीर अर्थ वाले होते हैं क्योंकि उनकी व्युत्पत्ति संस्कृत से हुई है और वे प्राकृत तथा अपभ्रंश में से हो कर छत्तीसगढ़ी के शब्द बन गये हैं। उनके तथा संस्कृत में पाये जाने वाले उनके रूपों के अर्थ में कोई अन्तर नहीं है जैसे कि संस्कृत का 'आर्द्र' शब्द प्राकृत में 'अद्द' बनने के बाद छत्तीसगढ़ी में 'ओद्दा' बन गया किन्तु इन सभी शब्दों के अर्थ एक अर्थात् "गीला" ही है। कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ी, अपने नित्य के प्रयोग में, प्राकृत और संस्कृत के अत्यन्त निकट है और छत्तीसगढ़ी बोलने वाले जाने अनजाने अपनी बोलचाल में संस्कृत के शब्दों को ही परिवर्तित रूप में बोलते हैं। छत्तीसगढ़ी के शब्द छत्तीसगढ़ी बोलने वालों को सहज ही देवभाषा संस्कृत तक पहुँचा देते हैं। यह छत्तीसगढ़ी की विशिष्टता है कि वह छत्तीसगढ़ की संस्कृति को अपने संस्कृत मूलक शब्दों के द्वारा विशुद्ध भारतीय बनाये हुई है।
Labels: छत्तीसगढ़
posted by जी.के. अवधिया @ 9:01 AM,
1 Comments:
- At 8:24 PM, Kaput Pratapgarhi said...
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Aapse milne ki ichcha hai, aisa lagata hai aap Raipur se hain, Main bhi Raipur se hoon
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